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बृहत्संहिता • अध्याय 43 • श्लोक 21
छित्त्वाचे चतुरङ्गुलमष्टो मूले जले क्षिपेद्यष्टिम्। उद्धृत्य पुरद्वारं शकटेन नवेन्मनुष्यैर्वा ॥
इस वृक्ष के आगे से चार अद्गुल और मूल से आठ अङ्गुल काटकर यष्टि (मध्यभाग) को जल में डाल देना चाहिये। बाद में जल से निकाल कर गाड़ी या मनुष्यों के द्वारा पुरद्वार पर उसको लाना चाहिये ।
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