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बृहत्संहिता • अध्याय 43 • श्लोक 37
उक्तं यदुत्तिष्ठति शक्रकेतौ शुभाशुभं सप्तमरीचिरूपैः । तज्जन्मयज्ञग्रहशान्तियात्राविवाहकालेष्वपि चिन्तनीयम् ॥
इन्द्रध्वज उठाने के समय अग्नि के स्वरूप द्वारा जो शुभाशुभ फल कहे गये हैं, उनका जन्मसमय, यज्ञकाल, ग्रहशान्ति, यात्रा और विवाहकाल में भी विचार करना चाहिये।
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