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बृहत्संहिता • अध्याय 43 • श्लोक 36
द्विरदमदमही सरोजलाजाघृतमधुना च हुताशने सगन्धे। प्रणतनृपशिरोमणिप्रभाभिर्भवति पुरश्छुरितेव भूर्नृपस्य ॥
यदि अग्नि में हाथियों के मदनल, लाजा (खीलें लाई = लावा), घी या शहद के समान सुगन्धि हो तो हवन कराने वाले राजा को प्रणाम करते हुये राजाओं के मुकुटों आगे की अधि रंगी गई-सो दिखाई देती है।
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