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बृहत्संहिता • अध्याय 43 • श्लोक 45
नवमं प्रवेयकं ददावन्यत्। रथचक्राभं दशमं सूर्यस्त्वष्टा एकादशमुद्वंशं विश्वेदेवाः हव्यभुग्वृत्तम् ॥
। कात्तिकेय ने अपना अनेक वर्ण का केयूर नामक सातवाँ आभूषण दिया। अग्नि ने अग्निशिखा की तरह कान्ति वाला और गोलाकार आठवाँ आभूषण दिया। इन्द्र ने वैदूर्यमणि के समान कान्ति वाला नवम कण्ठ का भूषण दिया।
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