मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें

अध्याय 2 — बोधि

रत्नगोत्रविभाग
73 श्लोक • केवल अनुवाद
शुद्धि, प्राप्ति, विसंयोग, स्व-परार्थ और उनका आश्रय, गाम्भीर्य, औदार्य और उनका महात्म्य यावत्काल यथावत्‌ रूप से ज्ञेय हैं।
स्वभाव हेतु फल द्वारा, कर्मयोग की प्रवृत्ति से, नित्य और अचिन्त्य से भी बुद्ध भूमि में अवस्थिति कहा गया है।
बुद्धत्व प्रकृतिप्रभावस्वर है यह जो कहा है उसमें आगन्तुक क्लेश आवरण तथा ज्ञेयावरण रूपी मेघ के घटाओं के जाल से आछादित सूर्य के तरह ही है। उस आच्छादन को, समग्र बुद्धगुणों से युक्त निर्मल, नित्य, ध्रुव, शाश्वत तत्त्व को धर्मौ के अकल्पनात्मक प्रविचयरूप ज्ञान के द्वारा देखा जा सकता है।
अविनिर्भाग तथा शुक्लधर्म से प्रभावित बुद्धत्व है जो सूर्य के तरह, आकाश के तरह तथा ज्ञान प्रहाण द्वय लक्षणयुक्त भी है।
गङ्गातीर में अवस्थित रजकणों के समान सङ्ख्यायुक्त सभी प्रभास्वर बुद्ध धर्मो से, जो अकृतक लक्षण सम्पन्न हैं और अभिनिर्भाग वृत्तियो से युक्त बुद्धत्व है।
स्वभाव-अपरिनिष्पन्न व्यापी होने से, और आगन्तुक होने से क्लेशवरण और ज्ञेयावरण से संयुक्त मेघ के तरह ही बुद्धत्व है।
दो आवरणों के विश्लेष (हटाने से) के द्वारा फिर दो ज्ञान निर्विकल्प और उसके पृष्ठभावी ज्ञान ही इष्ट है।
स्वच्छ जलयुक्त एवं प्रफुल्लित पद्म से ढके हुए सरोवर के तरह, राहु के मुख निकला हुआ पूर्ण चन्द्र के तरह, मेघ, धूल आदि क्लेश निर्मुक्त सूर्य के तरह विशिष्ट शुद्ध गुणों से भरा हुआ मुक्त व्यक्ति होता है।
मुनि, वृष, मधु, अन्न, सुवर्ण, निधान, फलयुक्त वृक्ष, सुगत विमल रत्न विग्रह, राजा, काञ्चन बिम्ब के तरह ही जिनत्व है।
राग आदि आगन्तुक क्लेशो की शुद्धि जलहृद के तरह ही निर्विकल्प ज्ञान का फल संक्षेप में बताया गया है।
सर्वाकार जो उत्तम बुद्धभाव का निदर्शन है और उसका पृष्ठभावी ज्ञान का फल यही परिदीपित किया गया है।
स्वच्छ सरोवर के तरह राग-रज-कालुष्य के नाश से विनेय (शिष्य) रूपी जल कमल के निष्यन्द (रस) के तरह ही वह बुद्धत्व है।
द्वेष रूपी राहु से मुक्त होने से, महान्‌ मैत्री कृपा किरणों से व्याप्त, जगत्‌ को प्रकाशित करने वाले पूर्ण तथा स्वच्छ चन्द्र के तरह ही वह ज्ञानी होता है।
मोह रूपी मेघों के हट जाने से, जगत्‌ में ज्ञानरश्मियो के द्वारा प्रकाशित करने से, अन्धकार को हटाने से स्वच्छ सूर्य के तरह ही वह बुद्धत्व है।
अतुल्य-समान-धर्मत्व से, सद्धर्म रूपी रसायन के दान से, तुच्छ वस्तु को हटाने से, अति मधु द्राक्षा के रस के तरह ही बुद्धत्व है।
पवित्रता से, गुण-द्रव्यों के दरिद्रता के हटने से, विमुक्ति रूपी फल के देने से भी वह बुद्धत्व सुवर्ण निधि (रत्न) के तरह ही है।
धर्म रत्न रूपी अपनापन होने से, मनुष्यों में अग्र स्थान प्राप्त करने के कारण से, रूप रत्न और आकृति होने से वह बुद्धत्व रत्न, नृप और सुवर्ण बिम्ब के तरह ही है।
अनास्रव, व्यापक, अविनाश धर्मी, ध्रुव, शिव, शाश्वत और अच्युत पद ही तथागतत्व जो गगनोपम है वह ६ इन्द्रियों के अनुभव के प्रयोजन में कारण कहा गया है।
ऐश्वर्यात्मक अर्थ के दर्शन में सदैव निमित्त भूत पवित्र सुन्दर कथा के श्रवण तथा तथागतों के पवित्र शील के सूँघने के लिए महान्‌ आर्य सद्धर्म के अग्ररस को जानने के लिए यही एक उपाय है।
समाधि संस्पर्श सुख की अनुभूति, स्वभावगाम्भीर्य नय का अवबोधन, सुसूक्ष्म चिन्तन रूपी परमार्थ गुफा रूप तथागत व्योम है जहाँ समग्र निमित्त नहीं रहते हैं।
ज्ञान द्वय (दो ज्ञानों का) के कर्म संक्षेप में जानना चाहिए। वह है मुक्तिकाय की पूर्ति तथा धर्मकाय का परिशोधन।
विमुक्तिकाय और धर्मकाय दो और एक से जानने चाहिए। अनास्रव, व्यापक और असंस्कृत पदों के द्वारा ही वर्णित हैं।
क्लेशों को अनास्रव का अर्थ है वासनाओं का निरोध। और असङ्ग अप्रतिघा तथा ज्ञान की व्यापकता से यह होता है।
असंस्कृतत्व और अत्यन्त अविनाशी स्वभाव के कारण, अविनाशित्व यहाँ उद्देश है और ध्रुव से उसका निर्देश किया गया है।
नाश चार प्रकार का है, धुव और अविपर्यय के कारण तथा पूर्ति-विकृति, उच्छित्ति, अचिन्त्य तथा नमनच्युति ही है।
उसके अभाव के कारण ध्रुव, शिव, शाश्वत तथा अच्युत पद ही वह अमल ज्ञान है जिसमें शुक्लधर्मो का निवास होता है।
अनिमित्त आकाश भी जैसे रूप देखने से निमित्त हो जाता है और शब्द, गन्ध, रस और स्पृश्य धर्मों के ग्रहण में ही यही स्थिति है।
धीर व्यक्त्यों के इन्द्रिय और उनके विषयों में अनास्रव गुणों के उदय होने पर वही कायद्वय का हेतु (कारण) हो जाता है उसी प्रकार अनवरण योग से भी होता है।
अचिन्त्य, नित्य, ध्रुव, शिव, शाश्वत, प्रशान्त, व्यापक, अविकल्प है आकाश के तरह। वह असङ्ग, सर्वत्र अप्रतिघ, परुष-स्पर्श रहित वह पवित्र बुद्धत्व न दृश्य है, न ग्राह्य है जो अत्यन्त शुभ भी है।
विमुक्तिकाय और धर्मकाय से क्रमशः स्वार्थसम्पत्‌ और परार्थ सम्पत्‌ जानना चाहिए। उनके सिद्ध हो जाने पर उस व्यक्ति में अचिन्त्य गुणों के साथ बुद्धत्व गुण रूप योग प्रकट हो जाता है।
तीन ज्ञानो का अविषय होने से सर्वज् का ज्ञान विषय, जो बुद्धत्व है देह धारियों के लिए अचिन्त्य कहा गया है।
सूक्ष्म होने से ज्ञान का अविषय, पारमार्थिक होने से चिन्ता का अविषय, धर्मता के गह्वर (गुफा) होने से लौकिक भावना का भी अविषय है।
बालों द्वारा बह कभी भी नहीं देखा गया है जैसाकि - जन्म से ही अन्धों के तरह और आर्यो ने भी नहीं देखा है जैसे कि प्रभातकालीन बादलों से घिरा हुआ बाल-सूर्य का बिम्ब हो।
उत्पत्ति न होने से वह नित्य है। निरोध न होने से ध्रुव है। द्वय के न होने से शिव है धर्मता के स्थिति के कारण शाश्वत भी है।
निरोध सत्य के होने से शान्त है, सर्व का अवबोध होने से व्यापक है, अप्रतिष्ठित होने से अकल्पनीय है, क्लेशों के न होने से अनासक्त भी है।
सर्व ज्ञेयावरणों के शुद्धि के कारण व्यापक और अप्रतिघ है। कोमलता होने से कठोरता भी बुद्धत्व में नहीं है।
अरूप होने से अदृश्य है, अनित्तों के कारण अग्राह्य, प्रकृति से ही शुद्ध होने से शुभ और मलों के नाश होने से अमल यह बुद्धत्व है।
आदि, मध्य और अन्तरहित, अभिन्न, अद्वय तथा तीन प्रकार से मुक्त, विमल एवं अविकल्प स्वरूप धर्मधातु का स्वभाव है, जिसे प्रयत्नशील होकर समाधि में प्रविष्ट योगी ही उसे देख सकते हैं।
असड्ख्क गङ्गानदी के बालुकाओं के समान अनन्त असमान गुणों से युक्त, समस्त वासनाओं के उन्मूलन के कारण दोष रहित वह तथागत धातु अत्यन्त पवित्र निर्मल कहा गया है।
विचित्र सद्धर्म रूप किरणों से युक्त होकर संसार के कल्याण के लिए उद्यम में लगा हुआ, साथ ही चिन्तामणि राजरत्न के तरह क्रियाओं में लगा हुआ, विचित्र भाव भङ्गिमा से युक्त है किन्तु वह स्वभाव उसमें नहीं है।
संसार में जो शान्ति के पथ का अवतार है उसका आदि कारण स्वरूप जो बिम्ब है वही बुद्ध बिम्ब है, वह भी हमेशा अवरुद्ध है जैसा कि रूप धातु आकाश धातु में अवरुद्ध (लगा हुआ) होता है।
स्वयंभुवों का जो बुद्धत्व और सर्वज्ञत्व कहा गया है, वह निर्वृति (निर्वाण) है, अचिन्त्य परम प्राप्ति है ओर प्रत्यात्मवेद्य भी है।
उसका तीन कार्यों से भेद किया जाता है - जो स्वाभाविक, गाम्भीर्य और औदार्य के रूप में हैं, वे महात्म्य, गुण तथा धर्मों से प्रभावित हैं।
स्वाभाविक कार्य जो बुद्धों का है वह पाँच लक्षणों से परिसम्पन्न है और पाँच आकारों के गुणों से पूर्ण है संक्षेप में यह जानना चाहिए।
असंस्कृत, अभिन्न, दो अन्तों से रहित, क्लेश, ज्ञेय और समापत्ति रूप तीन आवरणों से रहित भी है।
विमल होने से, अविकल्पित होने से जो योगियों के ज्ञान का विषय है। धर्मधातु के स्वभावयुक्त होने से प्रभास्वर तथा विशुद्ध भी है।
वह (बुद्ध का स्वाभाविक कार्य) अप्रमेय, असङ्ख्य, अचिन्त्य, असमान गुणों से युक्त है तथा विशुद्ध-पारमिता के प्राप्ति से निर्मल स्वाभाविक कार्य है।
इस शरीर में क्रमशः कैवल्य (निर्वाण) गुणों के कारण, वासनाओं के न होने से, अप्रमेय होने से, उदार, अगण्य एवं तर्क के अगोचर होने से वे सभी गुण रहते हैं।
विविध धर्मों के आनन्दस्वरूप प्रकट होने के कारण तथा शुद्ध करुणा के प्रवाह से प्राणियों के कल्याण और उनके उद्देश्यों की सिद्धि कराने के कारण।
वह निर्विकल्प और निराभोग होते हुए भी, प्राणियों की अभिप्राय (इच्छाओं) को पूर्ण करता है; जैसे चिन्तामणि के प्रभाव से (इच्छाएँ पूरी होती हैं), उसी प्रकार बुद्ध के सांभोगिक रूप की व्यवस्था होती है।
देशना, दर्शन, कृत्य की सिद्धि, प्राणियों का परिपाक (उद्धार), और जो उस (परम सत्य) के स्वभाव नहीं हैं उनका निरूपण — इस प्रकार उसे पाँच प्रकार से विविध रूप में कहा गया है।
जैसे विभिन्न रंगों के कारण मणि में वे रंग वास्तव में न होते हुए भी प्रकट हो जाते हैं, उसी प्रकार विभिन्न प्राणियों की भिन्न-भिन्न प्रवृत्तियों के कारण सर्वव्यापी (बुद्ध) में भी वे भाव वास्तव में न होते हुए भी प्रकट होते हैं।
लोक को जानने वाला (बुद्ध) महान करुणा से समस्त संसार को देखकर, धर्मकाय से निरंतर विविध रूपों वाले निर्माणों (निर्‍माण-कायों) के माध्यम से प्रकट होता है।
(बुद्ध) के जातक, विभिन्न लोकों में उत्पत्ति, तुषित लोक से अवतरण, गर्भ में प्रवेश, जन्म, शिल्प तथा कलाओं में निपुणता — (ये सब उनके प्रकट होने के रूप हैं)।
अन्तःपुर में रमण और क्रीड़ा, गृहत्याग (नैष्क्रम्य), दुःख का अन्वेषण करते हुए विचरण, बोधिमण्ड में पहुँचना और मार की सेना का दमन।
बुद्ध, जो अभी संसार में स्थित हैं, वे अशुद्ध क्षेत्रों (अपरिपक्व जीवों की अवस्था) में सम्बोधि (पूर्ण ज्ञान), धर्मचक्र-प्रवर्तन तथा निर्वाण की प्राप्ति की क्रिया का प्रदर्शन करते हैं।
उपाय-कुशल बुद्ध अनित्य, दुःख, अनात्मा और शान्ति जैसे उपदेशों द्वारा त्रिभव (तीनों लोकों) के प्राणियों को संसार से विरक्त करके उन्हें निर्वाण की ओर ले जाते हैं।
जो साधक शान्ति के मार्ग में प्रविष्ट होकर निर्वाण को प्राप्त मान लेते हैं, उन्हें सद्धर्मपुण्डरीक आदि धर्मों के तत्त्व का प्रकाश करके आगे का सत्य प्रकट किया जाता है।
उनके पूर्वग्रहों को दूर करके, प्रज्ञा और उपाय के सहारे उन्हें परिपक्व बनाकर उत्तम यान (महायान) में स्थापित किया जाता है और अंततः श्रेष्ठ बोधि (सम्यक् बुद्धत्व) के लिए उनका व्याकरण (भविष्यवाणी) किया जाता है।
इन उपदेशों में क्रमशः सूक्ष्मता, प्रभाव-सम्पन्नता और बालकों (अपरिपक्व जीवों) को पार ले जाने की क्षमता के कारण बुद्धधर्म का गाम्भीर्य, उदारता और महात्म्य समझना चाहिए।
यहाँ पहला धर्मकाय है और बाद के दो रूपकाय हैं। जैसे आकाश में स्थित वस्तु का आधार आकाश ही होता है, उसी प्रकार अंतिम (रूपकाय) का आधार भी प्रथम (धर्मकाय) ही है।
धर्म की परम प्रभुता से वह (बुद्ध) मृत्यु और मार (माया/विघ्न) को नष्ट कर देता है; और अपने स्वभाव की शून्यता के कारण वह लोकनाथ (जगत का स्वामी/मार्गदर्शक) शाश्वत रूप से स्थित माना जाता है।
शरीर, जीवन और भोगों का त्याग करके तथा सद्धर्म को धारण करके, और सभी प्राणियों के हित के लिए प्रतिज्ञा करके उन्हें पार कराने के कारण (वह ऐसा कहलाता है)।
बुद्धत्व में पूर्णतया शुद्ध करुणा की प्रवृत्ति होने से तथा ऋद्धिपादों (आध्यात्मिक शक्तियों) के प्रकाश से और उनके द्वारा स्थिर रहने की शक्ति के कारण।
ज्ञान के द्वारा संसार और निर्वाण—इन दोनों के ग्रहण से मुक्त होने के कारण, तथा सदैव अचिन्त्य समाधि और आनन्द की प्राप्ति से युक्त होने के कारण।
संसार में विचरते हुए भी लोकधर्मों से अप्रभावित रहने के कारण, और शान्ति रूप अमृत पद की प्राप्ति में मृत्यु और मार के प्रभाव को नष्ट कर देने के कारण।
उस मुनि का स्वभाव असंस्कृत (अजन्मा, अविकारी) होने के कारण और आदि से ही पूर्ण शान्त होने के कारण, तथा जो निराश्रित हैं उनके लिए वह नित्य आश्रय बनने के कारण।
पहले बताए गए सात कारणों से रूपकाय की नित्यता सिद्ध होती है, और अंतिम तीन कारणों से शास्ता (बुद्ध) के धर्मकाय की नित्यता सिद्ध होती है।
उसकी अनुत्तरता (जिससे बढ़कर कुछ नहीं) और संसार की शान्ति के लिए अनुग्रह करने के कारण, वह बुद्ध का विषय (बुद्ध-ज्ञान का क्षेत्र) ऐसा है जो आर्य पुरुषों के लिए भी अचिन्त्य है।
वह अचिन्त्य है क्योंकि उसे वाणी से व्यक्त नहीं किया जा सकता। परमार्थ होने के कारण वह कथन से परे है; और तर्क से परे होने के कारण वह केवल अनुमान से ही समझा जा सकता है।
उसकी अनुत्तरता के कारण वह अनुमान से जाना जाता है; और वह अनुत्तरता प्राणियों पर अनुग्रह करने से प्रकट होती है। यह अनुग्रह इसलिए है कि उसमें गुण और दोष का कोई भेद या विकल्प नहीं रहता।
पाँच कारणों से उसकी सूक्ष्मता के कारण धर्मकाय अचिन्त्य कहा जाता है, और छठे कारण से—क्योंकि वह तत्त्वस्वरूप से परे है—रूपकाय भी अचिन्त्य कहा जाता है।
अनुत्तर ज्ञान, महान करुणा आदि गुणों से युक्त जिन (बुद्ध) गुणों की पराकाष्ठा को प्राप्त होने के कारण अचिन्त्य हैं। इसलिए यह अंतिम क्रम भी स्वयंभू बुद्धों का ऐसा रहस्य है, जिसे अभिषेक से सिद्ध हुए महर्षि भी पूर्ण रूप से नहीं जान पाते।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें