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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 2 • श्लोक 16
पवित्रत्वादगुणद्रव्यदारिद्रयविनिवर्तनात्‌। विमुक्तिफलदानाच्च सुवर्णनिधिवृक्षवत्‌॥
पवित्रता से, गुण-द्रव्यों के दरिद्रता के हटने से, विमुक्ति रूपी फल के देने से भी वह बुद्धत्व सुवर्ण निधि (रत्न) के तरह ही है।
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