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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 2 • श्लोक 61
प्रथमो धर्मकायोऽत्र रूपकायौ तु पश्चिमौ । व्योम्नि रूपगतस्येव प्रथमेऽन्त्यस्य वर्तनम् ॥
यहाँ पहला धर्मकाय है और बाद के दो रूपकाय हैं। जैसे आकाश में स्थित वस्तु का आधार आकाश ही होता है, उसी प्रकार अंतिम (रूपकाय) का आधार भी प्रथम (धर्मकाय) ही है।
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