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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 2 • श्लोक 13
द्वेषराहुप्रमुक्तत्वान्महामैत्रीकृपांशुभिः। जगत्स्फरणतः पूर्णविमलेन्दूपमं च तत्‌॥
द्वेष रूपी राहु से मुक्त होने से, महान्‌ मैत्री कृपा किरणों से व्याप्त, जगत्‌ को प्रकाशित करने वाले पूर्ण तथा स्वच्छ चन्द्र के तरह ही वह ज्ञानी होता है।
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