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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 2 • श्लोक 38
अनादिमध्यान्तमभिन्नमद्वयं त्रिधा विमुक्तं विमलाविकल्पकम्‌। समाहिता योगिनस्तत्प्रयत्नाः पश्यन्ति यं धर्मधातुस्वभावम्‌॥
आदि, मध्य और अन्तरहित, अभिन्न, अद्वय तथा तीन प्रकार से मुक्त, विमल एवं अविकल्प स्वरूप धर्मधातु का स्वभाव है, जिसे प्रयत्नशील होकर समाधि में प्रविष्ट योगी ही उसे देख सकते हैं।
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