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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 2 • श्लोक 73
अनुत्तरज्ञानमहाकृपादिभिर्गुणैरचिन्त्या गुणपारगा जिनाः । अतः क्रमोऽन्त्योऽयमपि स्वयंभुवोऽभिषेकलब्धा न महर्षयो विदुरिति ॥
अनुत्तर ज्ञान, महान करुणा आदि गुणों से युक्त जिन (बुद्ध) गुणों की पराकाष्ठा को प्राप्त होने के कारण अचिन्त्य हैं। इसलिए यह अंतिम क्रम भी स्वयंभू बुद्धों का ऐसा रहस्य है, जिसे अभिषेक से सिद्ध हुए महर्षि भी पूर्ण रूप से नहीं जान पाते।
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