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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 2 • श्लोक 20
समाधिसंस्पर्शसुखानुभूतिषु स्वभावगाम्भीर्यनयाश्वबोधने। सुसूक्ष्मचिन्तापरमार्थगह्वरं तथागतव्योम निमित्तवर्जितम्‌॥
समाधि संस्पर्श सुख की अनुभूति, स्वभावगाम्भीर्य नय का अवबोधन, सुसूक्ष्म चिन्तन रूपी परमार्थ गुफा रूप तथागत व्योम है जहाँ समग्र निमित्त नहीं रहते हैं।
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