विचित्रसद्धर्ममयूखविग्रहे-र्जगद्विमोक्षार्थसमाहतोद्यम:। क्रियासु चिन्तामणिराजरत्नव-द्विचित्रभावो न च तत्स्वभाववान्॥
विचित्र सद्धर्म रूप किरणों से युक्त होकर संसार के कल्याण के लिए उद्यम में लगा हुआ, साथ ही चिन्तामणि राजरत्न के तरह क्रियाओं में लगा हुआ, विचित्र भाव भङ्गिमा से युक्त है किन्तु वह स्वभाव उसमें नहीं है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
रत्नगोत्रविभाग के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
रत्नगोत्रविभाग के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।