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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 2 • श्लोक 18
अनास्त्रवं व्याप्यविनाशधर्मि च ध्रुवं शिवं शाश्वतमच्युतं पदम्‌। तथागतत्वं गगनोपमं सताम्‌ षडिन्दरियार्थानुभवेषु कारणम्‌॥
अनास्रव, व्यापक, अविनाश धर्मी, ध्रुव, शिव, शाश्वत और अच्युत पद ही तथागतत्व जो गगनोपम है वह ६ इन्द्रियों के अनुभव के प्रयोजन में कारण कहा गया है।
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