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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 2 • श्लोक 30
विमुक्तिधर्मकायाभ्यां स्वपरार्थो निदर्शितः। स्वपरार्थाश्रये तस्मिन्‌ योगोऽचिन्त्यादिभिर्गुणैः॥
विमुक्तिकाय और धर्मकाय से क्रमशः स्वार्थसम्पत्‌ और परार्थ सम्पत्‌ जानना चाहिए। उनके सिद्ध हो जाने पर उस व्यक्ति में अचिन्त्य गुणों के साथ बुद्धत्व गुण रूप योग प्रकट हो जाता है।
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