विमुक्तिकाय और धर्मकाय से क्रमशः स्वार्थसम्पत् और परार्थ सम्पत् जानना चाहिए। उनके सिद्ध हो जाने पर उस व्यक्ति में अचिन्त्य गुणों के साथ बुद्धत्व गुण रूप योग प्रकट हो जाता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
रत्नगोत्रविभाग के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
रत्नगोत्रविभाग के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।