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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 2 • श्लोक 62
धर्मेश्वर्यान्मृत्युमारावभङ्गानु नैःस्वा । भाव्याच्छाश्वतो लोकनाथः ॥
धर्म की परम प्रभुता से वह (बुद्ध) मृत्यु और मार (माया/विघ्न) को नष्ट कर देता है; और अपने स्वभाव की शून्यता के कारण वह लोकनाथ (जगत का स्वामी/मार्गदर्शक) शाश्वत रूप से स्थित माना जाता है।
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