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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 2 • श्लोक 70
अचिन्त्योऽनभिलाप्यत्वादलाप्यः परमार्थतः । परमार्थोऽप्रतितर्क्यत्वादतर्क्योऽनुमेयतः ॥
वह अचिन्त्य है क्योंकि उसे वाणी से व्यक्त नहीं किया जा सकता। परमार्थ होने के कारण वह कथन से परे है; और तर्क से परे होने के कारण वह केवल अनुमान से ही समझा जा सकता है।
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