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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 2 • श्लोक 6
स्वभावापरिनिष्पत्तिव्यापित्वागन्तुकत्वतः। क्लेशज्ञेयावृतिस्तस्मान्मेघवत्‌ समुदाहता॥
स्वभाव-अपरिनिष्पन्न व्यापी होने से, और आगन्तुक होने से क्लेशवरण और ज्ञेयावरण से संयुक्त मेघ के तरह ही बुद्धत्व है।
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