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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 2 • श्लोक 58
शान्तिमार्गावतीर्णांश्च प्राप्य निर्वाणसंज्ञिनः । सद्धर्मपुण्डरीकादिधर्मतत्त्वप्रकाशनैः ॥
जो साधक शान्ति के मार्ग में प्रविष्ट होकर निर्वाण को प्राप्त मान लेते हैं, उन्हें सद्धर्मपुण्डरीक आदि धर्मों के तत्त्व का प्रकाश करके आगे का सत्य प्रकट किया जाता है।
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