वैमल्यादविकल्पत्वाद्योगिनाँ गोचरत्वतः। प्रभास्वरं विशुद्धं च धर्मधातोः स्वभावतः ॥
विमल होने से, अविकल्पित होने से जो योगियों के ज्ञान का विषय है। धर्मधातु के स्वभावयुक्त होने से प्रभास्वर तथा विशुद्ध भी है।
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