यथानिमित्तमाकाशं निमित्तं रूपदर्शने। शब्दगन्धरसस्पृश्यधर्माणां च श्रवादिषु॥
अनिमित्त आकाश भी जैसे रूप देखने से निमित्त हो जाता है और शब्द, गन्ध, रस और स्पृश्य धर्मों के ग्रहण में ही यही स्थिति है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
रत्नगोत्रविभाग के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
रत्नगोत्रविभाग के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।