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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 2 • श्लोक 27
यथानिमित्तमाकाशं निमित्तं रूपदर्शने। शब्दगन्धरसस्पृश्यधर्माणां च श्रवादिषु॥
अनिमित्त आकाश भी जैसे रूप देखने से निमित्त हो जाता है और शब्द, गन्ध, रस और स्पृश्य धर्मों के ग्रहण में ही यही स्थिति है।
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