अचिन्त्यं नित्यं च ध्रुवमथ शिवं शाश्वतमथ प्रशान्तं च व्यापि व्यपगतविकल्पं गगनवत्। असक्तं सर्वत्राप्रतिघपुरुषस्पर्शविगतं न दृश्यं न ग्राह्य शुभमपि च बुद्धत्वममलम्॥
अचिन्त्य, नित्य, ध्रुव, शिव, शाश्वत, प्रशान्त, व्यापक, अविकल्प है आकाश के तरह। वह असङ्ग, सर्वत्र अप्रतिघ, परुष-स्पर्श रहित वह पवित्र बुद्धत्व न दृश्य है, न ग्राह्य है जो अत्यन्त शुभ भी है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
रत्नगोत्रविभाग के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
रत्नगोत्रविभाग के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।