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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 2 • श्लोक 29
अचिन्त्यं नित्यं च ध्रुवमथ शिवं शाश्वतमथ प्रशान्तं च व्यापि व्यपगतविकल्पं गगनवत्‌। असक्तं सर्वत्राप्रतिघपुरुषस्पर्शविगतं न दृश्यं न ग्राह्य शुभमपि च बुद्धत्वममलम्‌॥
अचिन्त्य, नित्य, ध्रुव, शिव, शाश्वत, प्रशान्त, व्यापक, अविकल्प है आकाश के तरह। वह असङ्ग, सर्वत्र अप्रतिघ, परुष-स्पर्श रहित वह पवित्र बुद्धत्व न दृश्य है, न ग्राह्य है जो अत्यन्त शुभ भी है।
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