मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 2 • श्लोक 48
उदारत्वादगण्यत्वात्‌ तर्कस्यागोचरत्वतः। कैवल्याद्वासनोच्छित्तेरप्रमेयादयः क्रमात्‌॥
इस शरीर में क्रमशः कैवल्य (निर्वाण) गुणों के कारण, वासनाओं के न होने से, अप्रमेय होने से, उदार, अगण्य एवं तर्क के अगोचर होने से वे सभी गुण रहते हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
रत्नगोत्रविभाग के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

रत्नगोत्रविभाग के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें