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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 2 • श्लोक 45
असंस्कृतमसंभिन्नमन्तद्वयविवर्जितम्‌। क्लेशज्ञेयसमापत्तित्रयावरणनिःसृतम्‌॥
असंस्कृत, अभिन्न, दो अन्तों से रहित, क्लेश, ज्ञेय और समापत्ति रूप तीन आवरणों से रहित भी है।
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