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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 2 • श्लोक 25
नाशश्चतुर्विधो ज्ञेयो ध्रुवत्वादिविपर्ययात्‌। पू्तिर्विकृतिरु च्छित्तिरचिन्त्यनमनच्युतिः॥
नाश चार प्रकार का है, धुव और अविपर्यय के कारण तथा पूर्ति-विकृति, उच्छित्ति, अचिन्त्य तथा नमनच्युति ही है।
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