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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 2 • श्लोक 67
असंस्कृतस्वभावस्य मुनेरादिप्रशान्तितः । नित्यमशरणानां च शरणाभ्युपपत्तितः ॥
उस मुनि का स्वभाव असंस्कृत (अजन्मा, अविकारी) होने के कारण और आदि से ही पूर्ण शान्त होने के कारण, तथा जो निराश्रित हैं उनके लिए वह नित्य आश्रय बनने के कारण।
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