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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 2 • श्लोक 3
बुद्धत्वं प्रकृतिप्रभास्वरमिति प्रोक्तं यदागन्तुकक्लेशज्ञेयघनाभ्रजालपटलच्छन्नं रविव्योमवत्‌। सर्वर्बुद्धगुणैरुपेतममलैर्नित्यं ध्रुवं शाश्वतं धर्माणां तदकल्पनप्रविचयज्ञानाश्रयादाप्यते॥
बुद्धत्व प्रकृतिप्रभावस्वर है यह जो कहा है उसमें आगन्तुक क्लेश आवरण तथा ज्ञेयावरण रूपी मेघ के घटाओं के जाल से आछादित सूर्य के तरह ही है। उस आच्छादन को, समग्र बुद्धगुणों से युक्त निर्मल, नित्य, ध्रुव, शाश्वत तत्त्व को धर्मौ के अकल्पनात्मक प्रविचयरूप ज्ञान के द्वारा देखा जा सकता है।
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