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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 2 • श्लोक 17
धर्मरत्नात्मभावत्वाद्‌ द्विपदाग्राधिपत्यतः। रूपरत्नाकृतित्वाच्च तद्रत्ननृपबिम्बवत्‌॥
धर्म रत्न रूपी अपनापन होने से, मनुष्यों में अग्र स्थान प्राप्त करने के कारण से, रूप रत्न और आकृति होने से वह बुद्धत्व रत्न, नृप और सुवर्ण बिम्ब के तरह ही है।
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