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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 2 • श्लोक 15
अतुल्यतुल्यधर्मत्वात्‌ सद्धर्मरसदानतः। फल्गुव्यपगमात्तच्च सुगतक्षौद्रसारवत्‌॥
अतुल्य-समान-धर्मत्व से, सद्धर्म रूपी रसायन के दान से, तुच्छ वस्तु को हटाने से, अति मधु द्राक्षा के रस के तरह ही बुद्धत्व है।
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