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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 2 • श्लोक 28
इऱ्द्रियार्थेषु धीराणामनास्त्रवगुणोदये। हेतुः कायद्वयं तद्वदनावरणयोगतः॥
धीर व्यक्त्यों के इन्द्रिय और उनके विषयों में अनास्रव गुणों के उदय होने पर वही कायद्वय का हेतु (कारण) हो जाता है उसी प्रकार अनवरण योग से भी होता है।
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