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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 2 • श्लोक 55
अन्तःपुररतिक्रीडां नैष्क्रम्यं दुःखचारिकाम्‌। बोधिमण्डोपसंक्रान्तिं मारसैन्यप्रमर्दनम्‌॥
अन्तःपुर में रमण और क्रीड़ा, गृहत्याग (नैष्क्रम्य), दुःख का अन्वेषण करते हुए विचरण, बोधिमण्ड में पहुँचना और मार की सेना का दमन।
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