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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 2 • श्लोक 42
यत्तदबुद्धत्वमित्युक्तं सर्वज्ञत्वं स्वयंभुवाम्‌। निर्वृतिः परमाचित्त्यप्राप्ति: प्रत्यात्मवेदिता॥
स्वयंभुवों का जो बुद्धत्व और सर्वज्ञत्व कहा गया है, वह निर्वृति (निर्वाण) है, अचिन्त्य परम प्राप्ति है ओर प्रत्यात्मवेद्य भी है।
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