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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 2 • श्लोक 53
महाकरुणया कृत्स्नं लोकमालोक्य लोकवित्‌। धर्मकायादविरल॑ निर्माणैश्चित्ररूपिभिः॥
लोक को जानने वाला (बुद्ध) महान करुणा से समस्त संसार को देखकर, धर्मकाय से निरंतर विविध रूपों वाले निर्माणों (निर्‍माण-कायों) के माध्यम से प्रकट होता है।
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