मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 2 • श्लोक 71
अनुमेयोऽनुत्तरत्वादानुत्तर्यमनुग्रहात् । अनुग्रहः प्रतिष्ठानाद्गुणदोषाविकल्पनात् ॥
उसकी अनुत्तरता के कारण वह अनुमान से जाना जाता है; और वह अनुत्तरता प्राणियों पर अनुग्रह करने से प्रकट होती है। यह अनुग्रह इसलिए है कि उसमें गुण और दोष का कोई भेद या विकल्प नहीं रहता।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
रत्नगोत्रविभाग के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

रत्नगोत्रविभाग के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें