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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 2 • श्लोक 37
अदृश्यं तदरूपित्वादग्राह्ममनिमित्तत:। शुभं प्रकृतिशुद्धत्वादमलं मलहानित:॥
अरूप होने से अदृश्य है, अनित्तों के कारण अग्राह्य, प्रकृति से ही शुद्ध होने से शुभ और मलों के नाश होने से अमल यह बुद्धत्व है।
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