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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 2 • श्लोक 35
शान्तं निरोधसत्यत्वादव्यापि सर्वावबोधत:। अकल्पमप्रतिष्ठानादसक्तं क्लेशहानितः॥
निरोध सत्य के होने से शान्त है, सर्व का अवबोध होने से व्यापक है, अप्रतिष्ठित होने से अकल्पनीय है, क्लेशों के न होने से अनासक्त भी है।
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