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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 2 • श्लोक 12
स्वच्छाम्बुहृदवद्रागरजः कालुष्यहानितः। विनेयाम्बुरुहध्यानवार्यभिष्यन्दनाच्च तत्‌॥
स्वच्छ सरोवर के तरह राग-रज-कालुष्य के नाश से विनेय (शिष्य) रूपी जल कमल के निष्यन्द (रस) के तरह ही वह बुद्धत्व है।
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