द्रयावरणविश्लेषहेतुर्ज़ानद्वयं पुनः। निर्विकल्पं च तत्पृष्ठलब्धं तज्ज्ञानमिष्यते॥
दो आवरणों के विश्लेष (हटाने से) के द्वारा फिर दो ज्ञान निर्विकल्प और उसके पृष्ठभावी ज्ञान ही इष्ट है।
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