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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 2 • श्लोक 36
सर्वत्राप्रतिघं सर्वज्लेयावरणशुद्ध्धित:। परुषस्पर्शनिर्मुक्तं मृदुकर्मण्यभावतः॥
सर्व ज्ञेयावरणों के शुद्धि के कारण व्यापक और अप्रतिघ है। कोमलता होने से कठोरता भी बुद्धत्व में नहीं है।
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