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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 2 • श्लोक 50
निर्विकल्पं निराभोगं यथाभिप्रायपूरितः। चिन्तामणिप्रभावद्धेः सांभोगस्य व्यवस्थितिः॥
वह निर्विकल्प और निराभोग होते हुए भी, प्राणियों की अभिप्राय (इच्छाओं) को पूर्ण करता है; जैसे चिन्तामणि के प्रभाव से (इच्छाएँ पूरी होती हैं), उसी प्रकार बुद्ध के सांभोगिक रूप की व्यवस्था होती है।
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