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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 2 • श्लोक 52
रङ्गप्रत्ययवैचित्र्यादतद्‌भावो यथा मणेः। सत्त्वप्रत्ययवैचित्र्यादतद्‌भावस्तथा विभो:॥
जैसे विभिन्न रंगों के कारण मणि में वे रंग वास्तव में न होते हुए भी प्रकट हो जाते हैं, उसी प्रकार विभिन्न प्राणियों की भिन्न-भिन्न प्रवृत्तियों के कारण सर्वव्यापी (बुद्ध) में भी वे भाव वास्तव में न होते हुए भी प्रकट होते हैं।
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