अध्याय 16 — षोडशोल्लासः
कुलार्णव
95 श्लोक • केवल अनुवाद
इस विधान से देव, दानव, गन्धर्व, सिद्ध, किन्नर, गुह्यक, विद्याधर, मुनि, यक्ष, नाग, अप्सराएँ, स्त्रियाँ, सिंह, व्याघ्र, सर्प आदि और अन्य सभी दुष्ट पशु भी साधक के वशीभूत हो जाते हैं, फिर साधारण मनुष्यों की क्या बात है।
भूतबाधा, अकाल, मृत्यु, रोगादि इसके प्रभाव से दूर होते हैं, इसमें सन्देह नहीं। त्रिलौह या भोजपत्र में उत्तम यन्त्र को बाहु में धारण करे, तो हे देवि! वह सब प्रकार से रक्षा करता है और आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, विद्यालाभ, यश और विजय जो-जो अभीष्ट होता है, उसकी प्राप्ति होती है, इसमें सन्देह नहीं।
हे कुलनायिके! खदिर (कत्था), श्वेत मन्दार (अर्क मदार), पलाश (ढाक), उदुम्बर (गूलर), अश्वत्थ (पीपल), प्लक्ष (पाकड़), अपामार्ग, श्वेत कमल की समिधा तथा अन्य श्वेत शुभ द्रव्यों और फलों, भक्ष्य पदार्थों, खीर से एवं मधुरत्रय (चीनी, शहद, घी) या सुरा से युक्त तिल तण्डुल (चावल) द्वारा साधक हवन करे।
कदम्ब, अशोक, वकुल (अगस्त), पुन्नाग, आम, मधूक (महुआ), चम्पकद्वय, पलाश, पाटल (पाढर), श्री (बेल), कपित्थ (कैथा), मालती, मल्लिका (बेला) जाति, बन्धूक, अरुण कमल, कहलार, अरुण मन्दार, यूथि, कुन्द, जवा, नारिकेल, कदली, द्राक्षा, इक्षु, पृथुक, चन्दन, अगुरु, कपूर, रोचना, कुङ्कुम और अन्य तथा रक्त एवं शुभ द्रव्य आदि समिधा, पत्रपुष्प फलादि द्वारा, हे देवि! मन्त्रज्ञ पूर्ववत् विधिवत् हवन करे।
हे कुलेशानि! इससे राजा, यौवनगर्वित स्त्रियाँ, पुरुष, सिंह, व्याघ्र, दुष्ट पशु, हाथी, सिद्ध, देव, अप्सराएँ, यक्ष, गन्धर्व स्त्रियाँ तथा अन्य देवता आदि सभी वशीभूत होते हैं, इसमें सन्देह नहीं।
फिर नीम, कारस्कर, उन्मत्त, कण्टकी, विप्रदन्त, अस्थि, कण्टकादि वृक्षों और अशुभ साधनों द्वारा तथा कृष्णवर्ण के बटुकों एवं विभिन्न समिधाओं, पत्रफलों को गृहधूम, चिताङ्गार, त्रिकटु (पीपर, मिरिच, सोंठ) अम्ल चिता के अञ्जन को उन्मत्त के रस में अच्छी तरह भिगोकर पीसे और साध्य के पैरों को मिट्टी को चिताभस्म से युक्त कर साध्य की प्रतिमूर्ति बनाए। उसमें प्राणप्रतिष्ठा कर उसे कुण्ड के नीचे यथाविधि गाड़ दे। हे देवि! फिर मलिन मन से, उग्रदृष्टि होकर, अमर्ष के साथ मन्त्रज्ञ साधक सात विषतरुओं की लकड़ी से प्रज्वलित चिताग्नि में उक्त द्रव्यों से विधिवत् होम करे। इससे विद्वेषण, उच्चाटन, मारण होते हैं, इसमें सन्देह नहीं।