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अध्याय 16 — षोडशोल्लासः

कुलार्णव
95 श्लोक • केवल अनुवाद
श्री देवी ने कहा - हे कुलेश, हे करुणा रूपी अमृत के समुद्र, हे परमेश्वर! मैं काम्य कर्म के विधान को सुनना चाहती हूँ, कृपाकर उसे बताइए।
ईश्वर ने कहा - हे देवि! सुनिए। जो आपने मुझसे पूँछा है. उसे मैं कहता हूँ जिसके सुनने मात्र से श्रोता (काम्यकर्म के) प्रयोग में निपुण हो जाता है।
हे प्रिये! मन्त्र साधक विशुद्ध हृदय से पूर्वोक्त (पूर्व के सभी उल्लसों में कहे गए) नियमों से युक्त होकर 'श्री प्रासाद परामन्त्र' का पाँच लाख जप करे।
हे देवि! (अग्नि संस्कार से) संस्कृत हव्यवाहन में (जप संख्या के) दशांश से होम करना चाहिए और उसके दशांश से दुग्ध, जल एवं शालि के चावल (अक्षत) से तर्पण करे।
हे प्रिये! गन्ध, पुष्प, अक्षत मनः संकल्पित धन एवं वस्त्र आदि भक्ष्य एवं भोज्य अन्न तथा पानादि और अन्य मनोहर हव्य द्रव्यों से यथाशक्ति विभव एवं विस्तार के साथ योगिनी चक्र की पूजा करना चाहिए।
हे देवि! इस प्रकार न्यास, जप, ध्यानपूर्वक होमार्चन और तर्पण करने से मन्त्र सिद्ध होकर साधक साक्षात् परशिव स्वरूप हो जाता है।
हे कुलनायिके! इसके बाद ही बुद्धिमान् साधक भुक्ति एवं मुक्ति के लिए इस (परा प्रासाद) मन्त्र से अपने अभीष्ट प्रयोगों का साधन करे। इसमें सन्देह नहीं है कि सिद्धमन्त्र का षट्‌कर्म (मारण, मोहन, वशीकरण, उच्चाटन, स्तम्भन और शान्ति) में प्रयोग सिद्धि प्रदान करता है। असिद्ध मन्त्र सिद्ध नहीं होते और साांधक देवता का शाप प्राप्त करता है।
हे प्रिये! काम्य प्रयोग करने वालों का मोक्ष नहीं होता। उन्हें अपने प्रयोगों में सिद्धि मिलती है, यही उनकी सफलता है।
एक विधान के दो फल कहीं भी नहीं मिलते। हे देवेशि! इसीलिए देवता का यजन निष्काम भाव से करना चाहिये।
होम, तर्पण, मन्त्रादि से न्यास एवं ध्यान द्वारा अपने और दूसरों के षट्‌कर्मों को करे।
प्रयोग के दोषों की शान्ति के लिए और अपनी रक्षा के लिये प्रयोग के अन्त में विधि पूर्वक चक्रपूजा करे और न्यास ध्यानपूर्वक मन्त्र का एक लाख जप कर ले। नहीं तो, अभीष्ट फल नहीं मिलता, अपितु देवता का शाप मिलता है।
तिथि, वार, नक्षत्र, योग, मास, ऋतु, पक्ष, दीप एवं उनके स्वामियों और कुलचक्रों को जानकर कर्म को सिद्ध करे।
ऋषि, छन्द, बीज, शक्ति, कोलक, देवता, अङ्गन्यास, ध्यान और पूजन को जानकर मन्त्रों की साधना करे।
पुत्र, बान्धव और पत्नी तथा राशि एवं वर्ण की अनुकूलता, भूतमैत्री तथा उदय अन्त को जानकर मन्त्र की साधना करें।
मन्त्र और विद्या की अभिन्नता, उनके निद्रा और बोधरूपों तथा स्त्री-पुं-नपुंसकादि लिङ्गभेद को जानकर कर्मों को सिद्ध करे। स्वर, वर्ण और पद, चैतन्य और सूतक तथा हस्व, दीर्घ, प्लुत आदि को जानकर मन्त्र की साधना करे।
पञ्चशुद्धि, आसन, प्राणायाम, न्यास, अक्षमाला, मन्त्रदोष, मन्त्रसंस्कार और मुद्रा आदि को जानकर क्रिया करे।
इसी प्रकार आसन, दिग्बन्ध, नाडी बन्धादि, तत्त्व सङ्गति, देवता, काल एवं मुद्रादि को जानकर कर्म सिद्ध करे।
१. साध्य, २. साधक, ३. कर्म, ४. लेखनी और ५. द्रव्य - इन पाँचों को तथा स्थान, यन्त्र और प्रमाण का जानकर कर्मसाधना करे।
उत्पत्ति, वासना, वर्ण स्वरूप, मूर्ति, संस्कारविधि, कुण्ड एवं उसके द्रव्यों की मात्रा को जानकर होम करे।
अग्नि की प्रभा, धुएँ और वर्ण, ध्वनि, गन्ध, शिखा, आकृतियों और शुभ चेष्टादि को जानकर शुभ तथा अशुभ का निर्णय करे।
मन्त्र तन्त्र के अनुसंधान से देहावेशादि लक्षण और मन्त्रोच्चारण के भेद को जानकर साधना करे।
मण्डल, कलश, द्रव्य, शुद्धि, गन्धाष्टक, दीक्षा, नामकरण आदि को जानकर दीक्षाकर्म करे।
नित्य, नैमित्तिक, काम्य, नियम, नामों की भावना, पूजनविधि और धारण यन्त्रों आदि को जानकर साधना करे।
पूजागृह में प्रवेश की विधि, कुलपूजा के लक्षण व कुलद्रव्यादि की शोधन विधि जानकर पूजा करे। अन्तर्याग, बहिर्याग, घट और अर्घ्यपात्र की स्थापना विधि आदि पञ्च पुष्पाञ्जलि की विधि जानकर साधना करे।
हे देवि! पात्र, आधार, अलि (मद्य), पिशित (मांस), कला, मुद्रा, अध्वमेलन और बटुकादि बलि की विधि को जानकर कर्म करे।
हे देवि! कुल अकुल नामक सहज गति, शक्तिभेद, शुभ लक्षण, स्त्री के संस्कार व अर्चन की विधि आदि और सम्भोग काल को जानकर साधक शक्ति ग्रहण करे।
साधक पानभेद, उनके फल, उल्लास के प्रमाण, स्थिति, लक्षण और तत्त्वत्रय स्वीकार करने की विधि को जानकर कुलसुधा का पान करे।
हे प्रिये! चक्र में प्रवेश करने की विधि, प्रणाम करना, चक्र में स्थित रहना और उससे बाहर जाना तथा योगिनी की योग चेष्टाओं को जानकर साधक 'कौलिक' होता है।
रति के उल्लासकाल, कुलदीप के निवेदन और शान्तिस्तव आदि के पाठ की विधि को जानकर साधक 'कुलदेशिक' होता है।
मिथुन के अनुग्रह, अष्टाष्टपूजन, पुष्पिणी कुमारी का अर्चन और विशेष तिथियों के पूजन को जानकर साधना करे।
आम्नायभेद, सङ्केत, पुष्प सङ्कोच, गुरुत्रय और (कुल) सम्प्रदाय को जानकर साधना करे।
श्रौत विद्या, कुलाचार, मन्त्रों के भेद, पादुका और हे देवि! चरणत्रितय को जानकर साधना करे।
अपने साधनक्रम से अधिक, समान और न्यून कौलिक आराधनक्रम को और सिद्ध मुद्राओं एवं अर्चन आदि को जानकर कर्म करे।
गुरु एवं कुलाग्नि, प्रेतसंस्कार, अन्त्येष्टि, दिग्बलि और मोक्षदीप आदि को विधि विधान को जानकर साधना करे। हे कुलनायिके! ये सब कुछ विशेष बातें कही गई हैं, वैसे सभी मन्त्रों की विधि का क्रम सामान्य ही है।
हे प्रिये! मन्त्रों के पुरुष देवता होते हैं और विद्याओं की स्त्री देवता होती है। 'हूं' और 'फट्' जिन मन्त्रों के अन्त में हैं, वे पुरुषमन्त्र हैं, उनमें प्राण दक्षिण (पिङ्गला) की ओर चलता है। जिन मन्त्रों के अन्त में 'स्वाहा' है, हे प्रिये! वे स्त्रीदेवता वाले मन्त्र है और उनमें पाण बाई (इडा की) ओर चलता है। 'नम': से अन्त होने वाले मन्त्र नपुंसक होते हैं और उनमें प्राणवायु दोनों नासिकाओं से चलती है।
शान्तिकर्म में सौम्य' मन्त्र का प्रयोग किया जाता है और इनके अधिक वर्ण चन्द्र एवं अमृत तत्त्व वाले होते हैं तथा अन्त में 'स्वाहा' होता है। क्रूर कर्मों में आग्नेय मन्त्रों का प्रयोग होता है। पुष्टि (समृद्धि) कर्मों में 'फट्' से युक्त मन्त्रों का, वशीकरण में वषट् से युक्त और मारण कर्मों में 'हूँ फट्' का प्रयोग होता है। स्तम्भन कर्मों में में नमः न का और शान्ति, पुष्टि कर्मों में 'स्वाहा' का प्रयोग होता है।
होम और तर्पण में 'स्वाहा', न्यास और पूजन में 'नमः' का प्रयोग मन्त्र के अन्त में करना चाहिए। साधक को जपकाल में परिस्थिति के अनुसार इनका प्रयोग करना चाहिये।
शान्तिकर्म में रजत और ताम्रपत्र, वश्य में भोजपत्र, सभी कर्मों में स्वर्णपत्र और क्रूर कर्मों में प्रेतकर्पट (कफन) विहित है।
शान्तिकर्म में त्रिगन्ध, वश्य में पञ्चगन्ध, सभी कार्यों में अष्टगन्ध, और क्रूर कर्मों में अष्ट विषों का प्रयोग करे।
शान्तिकर्म में दूर्वा की कलम, वश्य में मयूरपुच्छ की, सभी कर्मों में स्वर्ण की और क्रूर कमों में काग पुच्छ की लेखनी का प्रयोग करे।
शान्तिकर्म अपने घर में, वश्यादि देवी मन्दिर में, सभी कार्य देवालय में और क्रूर कर्म श्मशान में करे।
हे प्रिये! इस प्रकार मन्त्रज्ञ साधक उक्त लक्षणों को गुरुमुख से जानकर सभी कर्मों को उनका फल पाने के लिये विधिपूर्वक अनुष्ठान करे।
मूलाधार में तरुण सूर्य के समान आभा वाले प्रासाद बीज का और शिर में अयुत चन्द्रों के समान प्रभा वाले पराबीज का ध्यान करते हुये उनके परस्पर स्पर्श से उत्पन्न आनन्द से पुलकित होते हुये मूलाधार से ब्रह्मरन्ध्र तक अबाध रूप से परामृत रस के सिञ्चन द्वारा पैरों से मस्तक तक अपने को जो नित्य आप्लावित अनुभव करता है, वह अजर और अमर होता है।
हे कुलेशानि! इस प्रकार ध्यान करते हुये जो सभी कर्मों की साधना करता है, हे देवि! उसे शीघ्र सिद्धि मिलती है, इसमें सन्देह नहीं।
हे प्रिये! सब सिद्धियों के देने वाले ध्यान के भेद बताऊँगा, जिससे पूजा और होमादि के बिना अभीष्ट की प्राप्ति होती है।
किसी मनोहर स्थान में स्थिर मन होकर साधक सुखासन पर बैठे। फिर गुरु वन्दनापूर्वक अपने मस्तक में स्थित पूर्ण चन्द्र के उज्ज्वल मण्डल का ध्यान करे। हे प्रिये! उस मण्डल के मध्य में मोती, स्फटिक, कर्पूर, कुन्द, पुष्प और चन्द्रमा के समान धवल तथा सोलह स्वरों से युक्त श्री प्रासाद परावीज का चिन्तन करे।
निश्चल अन्तरात्मा में स्थित उस चन्द्रमण्डल से निकलती हुई सुधा से अपने शरीर को आप्लावित होता हुआ नित्य अनुभव करे। इससे सभी आरेष्ट नष्ट होकर शुभ, श्री और पुष्टि का लाभ होता है।
हे प्रिये! तरुणोल्लास से युक्त होकर श्री प्रासादपरा मन्त्र का १००८ बार जप क्र मण्डलपूजा करे।
इससे अपमृत्यु, महान् रोग, जरा और मरणजन्य भय तथा ग्रह, अपस्मार, वेताल भूतोन्माद से होने वाले भय दूर होकर आधि व्याधि से रहित होकर साधक पुत्र पौत्र से सम्पन्न होता हुआ सौ वर्ष तक जीवित रहता है। साथ ही सभी मनुष्यों द्वारा पूजित होता है।
अश्रुत शास्त्र को वह समझ लेता है, निर्मल कविता रचने लगता है और साक्षात् चिन्मय हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं।
ज्वर एवं उन्मादादि रोगों में शिर में ध्यान करता हुआ जप करे। शूल, वात, व्रण, ग्रन्थि, मूत्रकृच्छ्र आदि के होने पर हे देवेशि। उन उन स्थानों में पूर्ववत् ध्यान करता हुआ जप करे। महारोग के उत्पन्न होने पर सभी अङ्गों में ध्यान करे। इससे तुरन्त सभी रोग शान्त होते हैं, इसमें सन्देह नहीं।
दसों इन्द्रियों में जो ध्यान करता है, उसकी इन्द्रियाँ सुसंयत हो जाती है। जहाँ बीज का स्मरण किया जाता है, वहीं वैसा फल निश्चय ही होता है।
जो सदा मूर्हिन में ध्यान करता है, वह अजर और अमर होता है। हे प्रिये! सब रोगों को नष्ट करने वाले, ज्ञान और आरोग्यदायक इस ध्यान से श्रेष्ठ अन्य कुछ नहीं है, यह सत्य है, इसमें सन्देह नहीं। हे देवि! सात्त्विक ध्यान का ऐसा ही फल कहा गया है।
सभी शान्तिकर्मों को इसी विधि से सम्पत्र करे। हे देवेशि! इस विधि से अतुल सौभाग्य होता है।
बारह आधार पद्मों में बारह स्वरों से संयुक्त बीज का ध्यान करने से साधक अजर अमर होता है। छः आधारों में, छः दीर्घ स्वरों से युक्त बीज का ध्यान करने से हे कुलनायिके! उन आधारों में स्थित देवियों द्वारा साधक पूजित होता है।
हृदयकमल की कर्णिका के मध्य में सूर्यमण्डल में स्थित पराप्रासाद बीज का ध्यान इस प्रकार करे कि वह तरुण अरुण के समान प्रकाशमान है, जवा, बन्धूक, पद्मराग जैसी उसकी उज्ज्वल सिन्दूरी प्रभा है। पचीस स्पर्शाक्षरों से वेष्टित उसके प्रभा पटल की छाया से तीनों लोक रक्ताभ दिखाई देते हैं और हे देवि! निश्चल अन्तरात्मा से अपने को भी उसी से अभिभूत अनुभव करे।
विद्वान् साधक तरुणोल्लास के सहित परा प्रासाद बीज का १००८ बार जप मण्डल में करे।
इस विधान से देव, दानव, गन्धर्व, सिद्ध, किन्नर, गुह्यक, विद्याधर, मुनि, यक्ष, नाग, अप्सराएँ, स्त्रियाँ, सिंह, व्याघ्र, सर्प आदि और अन्य सभी दुष्ट पशु भी साधक के वशीभूत हो जाते हैं, फिर साधारण मनुष्यों की क्या बात है।
हे प्रिये! (ज़प से) साधक महान् ऐश्वर्य और स्वर्गीय भोगादि को प्राप्त करता है। मस्तक में जिसका स्मरण करते हुये जप किया जाता है, वह शीघ्र ही वश में हो जाता है।
हे देवि! राजस ध्यान का ऐसा ही फल कहा है। सभी वश्य कर्मों को इसी विधि से सम्पन्न करे।
हे देवि! यह सभी वश्य कर्मों को सिद्ध करने वाला एवं सभी ऐश्वर्यों का फल देने वाला है। इस ध्यान से श्रेष्ठ ध्यान अन्य नहीं है, यह सत्य है, इसमें सन्देह नहीं।
हे परमेश्वरि! त्रिकोण, षट्‌कोण, अष्टार और भूपुर की रचना करे तथा उसके मध्य में साध्यनाम से युक्त मूलमन्त्र को लिखे।
षट्‌कोणों में षडङ्गों को लिखे। हे पार्वति! केशरों में आठ स्वरों को और पत्रों में वर्गों को लिखे।
हे अम्बिके! भूपुर के चार कोनों में मूलमन्त्र को लिखे। पाँच रंगों को मिट्टी से यन्त्र को सुन्दर बनाये। इस प्रकार विधिवत् यन्त्र को लिखकर मन्त्रवेत्ता साधक यन्त्र के मध्य में और हे प्रिये! भूपुर के चारों कोनों में क्रमशः एक, तीन, छः, आठ, चार-कुल बाईस कलशों की स्थापना करे। हे प्रिये! हे ईशानि! अथवा अथवा उत्तम साधक यथासामर्थ्य १८, १०, ७, ४ या केवल एक ही कलश स्थापित करे।
कलशों में विधिवत् अस्थि, रक्त, शिरा, तन्तु, मिट्टि रूप मांस और चर्म वस्वादि से युक्त, रुधिररूप जल और प्राणप्रतिष्ठा मन्त्र से प्रतिष्ठित कलश देवताओं और उनके अङ्ग देवताओं एवं भैरवों के सहित माताओं का तथा हे प्रिये! विदिशाओं में गणेश, दुर्गा, क्षेत्रपाल आदि का पूजन कर सभी पापों की शान्ति के लिये कलशस्थ जल से प्रिय शिष्य का अभिषेक करे।
आरोग्य आदि की प्राप्ति इससे आयु, लक्ष्मी, कान्ति, सौभाग्य, ज्ञान, होती है। इस प्रकार अभिषिक्त राजा को चारों दिशाओं में सागर तक व्याप्त पृथ्वी पर अधिकार मिलता है।
अभिषिक्त अकिञ्चन को महान् ऐश्वर्य और अभिषिक्त वन्ध्या को सर्वगुणसम्पन्न पुत्र प्राप्त होता है।
भूतबाधा, अकाल, मृत्यु, रोगादि इसके प्रभाव से दूर होते हैं, इसमें सन्देह नहीं। त्रिलौह या भोजपत्र में उत्तम यन्त्र को बाहु में धारण करे, तो हे देवि! वह सब प्रकार से रक्षा करता है और आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, विद्यालाभ, यश और विजय जो-जो अभीष्ट होता है, उसकी प्राप्ति होती है, इसमें सन्देह नहीं।
पराप्रासादमन्त्र के जानने वाले को खड्‌गवश्य, वयः स्तम्भ, यक्षिणीसिद्धि, अञ्जनसिद्धि, पादुकासिद्धि, अणिमादि अष्टसिद्धियाँ, महारसरसायन, सञ्जीवयोग गुटिका आदि सभी मुख्य सिद्धियाँ निःसन्देह सुलभ होती हैं।
हे प्रिये! षट्‌कर्मों के प्रयोग कभी निष्फल नहीं होते।
देवता का ध्यान करते हुये साधक पूर्ववत् पीले द्रव्यों और हरिद्रा आदि से समिधा एवं पत्रफलों सहित हवन करे।
हे प्रिये! इससे वाणी, श्रवण, गति, दृष्टि, सेना, नदी, ग्रह, शत्रु, और हे देवि! विविध दुष्ट पशुओं का निःसन्देह स्तम्भन होता है।
हे प्रिये! ग्रहों के कोप, रोगों और दुष्टों का विनाश करने वाले ध्यान से श्रेष्ठ अन्य नहीं है, यह सत्य है, इसमें सन्देह नहीं।
हे देवि! तामस ध्यान का ऐसा ही फल कहा है। दुष्टों के मारणकर्मों को इसी विधान से करे।
हे प्रिये! गुरुमुख से इन ध्यान भेदों को जानकर षट्‌कमों को करे, हे वीरवन्दिते! अन्य प्रकार से नहीं करना चाहिए।
हे कुलनायिके! खदिर (कत्था), श्वेत मन्दार (अर्क मदार), पलाश (ढाक), उदुम्बर (गूलर), अश्वत्थ (पीपल), प्लक्ष (पाकड़), अपामार्ग, श्वेत कमल की समिधा तथा अन्य श्वेत शुभ द्रव्यों और फलों, भक्ष्य पदार्थों, खीर से एवं मधुरत्रय (चीनी, शहद, घी) या सुरा से युक्त तिल तण्डुल (चावल) द्वारा साधक हवन करे।
हे देवि! बड़ा या छोटा जैसा कार्य हो, उसके अनुसार ज्ञात कर उक्त सभी वस्तुओं से या किसी एक से एक हजार, तीन हजार या पाँच हजार आहुतियाँ दे।
हे कुलेश्वरि! हे प्रिये! कुण्ड में संस्कृत अग्नि में आवरणों सहित देवता का आवाहन एवं ध्यान जिस कर्म में जितना निर्दिष्ट हो, अयुत (दस हजार) या नियुत (एक लाख) या प्रयुत (दस लाख) आहुतियाँ, हे देवि! विधिवत् तन्मय होकर प्रदान करे।
इससे तत्क्षण ही सभी रोग, उन्माद, अपस्मार, यक्ष्माजन्य उत्पात और समस्त दुःख नष्ट हो जाते हैं, इसमें सन्देह नहीं। हे प्रिये! इससे सभी प्रकार की शान्ति, ज्ञान और विद्या का लाभ होता है।
कदम्ब, अशोक, वकुल (अगस्त), पुन्नाग, आम, मधूक (महुआ), चम्पकद्वय, पलाश, पाटल (पाढर), श्री (बेल), कपित्थ (कैथा), मालती, मल्लिका (बेला) जाति, बन्धूक, अरुण कमल, कहलार, अरुण मन्दार, यूथि, कुन्द, जवा, नारिकेल, कदली, द्राक्षा, इक्षु, पृथुक, चन्दन, अगुरु, कपूर, रोचना, कुङ्कुम और अन्य तथा रक्त एवं शुभ द्रव्य आदि समिधा, पत्रपुष्प फलादि द्वारा, हे देवि! मन्त्रज्ञ पूर्ववत् विधिवत् हवन करे।
हे कुलेशानि! इससे राजा, यौवनगर्वित स्त्रियाँ, पुरुष, सिंह, व्याघ्र, दुष्ट पशु, हाथी, सिद्ध, देव, अप्सराएँ, यक्ष, गन्धर्व स्त्रियाँ तथा अन्य देवता आदि सभी वशीभूत होते हैं, इसमें सन्देह नहीं।
बाजी लवण के होम से स्त्रियों का निश्चय ही आकर्षण होता है। हे देंवेशि! इस विधि से उत्तम सौभाग्य मिलता है।
यहाँ अधिक कहने से क्या लाभ, इस मन्त्रराज के द्वारा तीनों लोकों में मन्त्रज्ञ साधकों के लिए कुछ भी असाध्य नहीं है।
हे कुलेश्वरि! एक ऊर्ध्वाम्नाय में पारङ्गत, पराप्रासादमन्त्र का ज्ञाता और कुलार्णव के अर्थतत्त्व को जानने बाला जीवन्मुक्त होता है।
पराप्रासादमन्त्र का ज्ञाता उत्तम तीर्थ में, या तीर्थ रहित स्थान में, अथवा जल के मध्य में रहता हुआ मुक्त ही होता है, उसमें सन्देह नहीं।
हे पार्वति! दिशा, पीठ, क्षेत्र, मुद्रादि, वृक्ष, वल्ली, मठादि और ऊर्ध्वाम्नाय के भैरव तथा देवियों को पहले जान ले।
फिर नीम, कारस्कर, उन्मत्त, कण्टकी, विप्रदन्त, अस्थि, कण्टकादि वृक्षों और अशुभ साधनों द्वारा तथा कृष्णवर्ण के बटुकों एवं विभिन्न समिधाओं, पत्रफलों को गृहधूम, चिताङ्गार, त्रिकटु (पीपर, मिरिच, सोंठ) अम्ल चिता के अञ्जन को उन्मत्त के रस में अच्छी तरह भिगोकर पीसे और साध्य के पैरों को मिट्टी को चिताभस्म से युक्त कर साध्य की प्रतिमूर्ति बनाए। उसमें प्राणप्रतिष्ठा कर उसे कुण्ड के नीचे यथाविधि गाड़ दे। हे देवि! फिर मलिन मन से, उग्रदृष्टि होकर, अमर्ष के साथ मन्त्रज्ञ साधक सात विषतरुओं की लकड़ी से प्रज्वलित चिताग्नि में उक्त द्रव्यों से विधिवत् होम करे। इससे विद्वेषण, उच्चाटन, मारण होते हैं, इसमें सन्देह नहीं।
हे देवि! शान्ति कर्म में सात्त्विक श्वेत वर्ण का, वश्य कर्म में राजस रक्त वर्ण का, और हे देवि! क्रूर कर्म में तामस कृष्ण वर्ण का ध्यान करे।
आत्मरक्षा पहले कर ले, तब कर्म साधन करे। मोहवश जो ऐसा नहीं करता, वह देवता का पशु होता है।
अतः हे देवि! महाषोढ़ान्यास, पूजा एवं बलि करके बुद्धिमान् साधक कर्म करे, हे वीरवन्दिते ! बिना न्यास आदि के कार्य न करे।
हे प्रिये! मूलाधारकमल के मध्य में अग्नि का ध्यान कर उसके मध्य में प्रलयाग्नि के समान उज्ज्वल एवं प्रतिलोमक्रम में दस व्यापक अक्षरों से सम्पुटित पराप्रासादबीज (हसौ) का ध्यान करे।
साधक स्वयं महाप्रलय की कालाग्नि के समान सब प्राणियों के लिये भयङ्कर होकर दक्षिण की ओर मुख कर अत्यन्त उग्र दृष्टि के साथ, यौवनोल्लास सहित, पराप्रासादसंज्ञक मन्त्रमण्डल का १००८ जप करे।
अनिष्टकारी प्राणियों, कलह एवं कष्टदायक और व्यर्थ ही द्वेष करने जाले क्रूर लोगों, पूजा में विघ्न डालने वाले भूत, उपग्रह, वेताल, पिशाच, यक्ष, राक्षस आदि सदा कष्टदायक, दुष्ट जीवों को उक्त अग्नि के मध्य में गिर कर भस्म होते हुये चिन्तन करे। इससे क्षण भर में वे वैसे ही नष्ट हो जाते हैं, जैसे पतङ्गे अग्नि में भस्म होते हैं।
जिसके सिर में उक्त बीज का ध्यान किया जाता है, वह मृत्यु को प्राप्त करता है। उक्त ध्यान द्वारा, हे देवेशि! काल आदि का भी नाश होता है।
इस प्रकार हे प्रिये! मैंने काम्यकर्म की कुछ विधि संक्षेप में आपसे कही। अब हे कुलेशानि! आप क्या सुनना चाहती है?
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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