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कुलार्णव • अध्याय 16 • श्लोक 47
सच्चन्द्रबिम्बसञ्जातसुधाप्लावितविग्रहम् ॥ आत्मानं भावयेन्नित्यं निश्चलेनान्तरात्मना । सर्वारिष्टं विलीयेत शुभश्रीपुष्टिकारकम् ॥
निश्चल अन्तरात्मा में स्थित उस चन्द्रमण्डल से निकलती हुई सुधा से अपने शरीर को आप्लावित होता हुआ नित्य अनुभव करे। इससे सभी आरेष्ट नष्ट होकर शुभ, श्री और पुष्टि का लाभ होता है।
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