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कुलार्णव • अध्याय 16 • श्लोक 85
सुतीर्थे वाप्यतीर्थे वा जलमध्येऽपि वा वसन् । पराप्रासादमन्त्रज्ञो मुक्त एव न संशयः ॥
पराप्रासादमन्त्र का ज्ञाता उत्तम तीर्थ में, या तीर्थ रहित स्थान में, अथवा जल के मध्य में रहता हुआ मुक्त ही होता है, उसमें सन्देह नहीं।
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