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कुलार्णव • अध्याय 16 • श्लोक 46
स्थाने मनोहरे देवि साधकः स्थिरमानसः । स्थितो मृद्वासने ध्यायेद् गुरुवन्दनपूर्वकम् ॥ मस्तकस्थितसम्पूर्णचन्द्रमण्डलमध्यगम् । श्रीप्रासादपराबीजं षोडशस्वरसंयुतम् ॥ शुद्धस्फटिककर्पूरकुन्देन्दुधवलं प्रिये ।
किसी मनोहर स्थान में स्थिर मन होकर साधक सुखासन पर बैठे। फिर गुरु वन्दनापूर्वक अपने मस्तक में स्थित पूर्ण चन्द्र के उज्ज्वल मण्डल का ध्यान करे। हे प्रिये! उस मण्डल के मध्य में मोती, स्फटिक, कर्पूर, कुन्द, पुष्प और चन्द्रमा के समान धवल तथा सोलह स्वरों से युक्त श्री प्रासाद परावीज का चिन्तन करे।
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