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कुलार्णव • अध्याय 16 • श्लोक 65
अस्थिरक्तशिरातन्तुमृण्मांसं रुधिरं जलम् ॥ चर्मवस्त्रशिलाकूर्मनारिकेलफलं शिरः । मन्त्रप्राणसमायुक्तां यजेत् कलसदेवताम् ॥ सावित्रीनापराङ्गानि मातरोज भैरवान्विताः । विदिक्षु गुरुविघ्नेशदुर्गाक्षेत्रपतीन् प्रिये ॥ कलसेषु समभ्यर्च्य विधिवन्मन्त्रवित्तमः । अभिषिञ्श्चेत् प्रियं शिष्यं सर्वपापप्रशान्तये ॥
कलशों में विधिवत् अस्थि, रक्त, शिरा, तन्तु, मिट्टि रूप मांस और चर्म वस्वादि से युक्त, रुधिररूप जल और प्राणप्रतिष्ठा मन्त्र से प्रतिष्ठित कलश देवताओं और उनके अङ्ग देवताओं एवं भैरवों के सहित माताओं का तथा हे प्रिये! विदिशाओं में गणेश, दुर्गा, क्षेत्रपाल आदि का पूजन कर सभी पापों की शान्ति के लिये कलशस्थ जल से प्रिय शिष्य का अभिषेक करे।
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