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कुलार्णव • अध्याय 16 • श्लोक 51
ज्वरोन्मादादिरोगेषु जपेच्छिरसि चिन्तयन् । शूलवातव्रणग्रन्थिमूत्रकृच्छ्रादिसम्भवे तत्तत्स्थानेषु देवेशि पूर्ववच्चिन्तयन् जपेत् ॥ महारोगेषु जातेषु सर्वाङ्गेषु विचिन्तयेत् । तत्क्षणाच्छान्तिमायान्ति रोगाः सर्वे न संशयः ॥
ज्वर एवं उन्मादादि रोगों में शिर में ध्यान करता हुआ जप करे। शूल, वात, व्रण, ग्रन्थि, मूत्रकृच्छ्र आदि के होने पर हे देवेशि। उन उन स्थानों में पूर्ववत् ध्यान करता हुआ जप करे। महारोग के उत्पन्न होने पर सभी अङ्गों में ध्यान करे। इससे तुरन्त सभी रोग शान्त होते हैं, इसमें सन्देह नहीं।
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