ज्वर एवं उन्मादादि रोगों में शिर में ध्यान करता हुआ जप करे। शूल, वात, व्रण, ग्रन्थि, मूत्रकृच्छ्र आदि के होने पर हे देवेशि। उन उन स्थानों में पूर्ववत् ध्यान करता हुआ जप करे। महारोग के उत्पन्न होने पर सभी अङ्गों में ध्यान करे। इससे तुरन्त सभी रोग शान्त होते हैं, इसमें सन्देह नहीं।
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