मूलाधार में तरुण सूर्य के समान आभा वाले प्रासाद बीज का और शिर में अयुत चन्द्रों के समान प्रभा वाले पराबीज का ध्यान करते हुये उनके परस्पर स्पर्श से उत्पन्न आनन्द से पुलकित होते हुये मूलाधार से ब्रह्मरन्ध्र तक अबाध रूप से परामृत रस के सिञ्चन द्वारा पैरों से मस्तक तक अपने को जो नित्य आप्लावित अनुभव करता है, वह अजर और अमर होता है।
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