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कुलार्णव • अध्याय 16 • श्लोक 43
मूले प्रासादबीजञ्च तरुणादित्यसन्निभम् । उत्तमाङ्गे पराबीजं चन्द्रायुतसमप्रभम् ॥ परस्परजनस्पर्शजनितानन्दनिर्भरः । मूलादिब्रह्मरन्ध्रान्तं अनवच्छिन्नरूपिभिः ॥ परामृतरसासेकैः सिक्तमापादमस्तकम् । आत्मानं भावयेन्नित्यं स भवेदजरामरः ॥
मूलाधार में तरुण सूर्य के समान आभा वाले प्रासाद बीज का और शिर में अयुत चन्द्रों के समान प्रभा वाले पराबीज का ध्यान करते हुये उनके परस्पर स्पर्श से उत्पन्न आनन्द से पुलकित होते हुये मूलाधार से ब्रह्मरन्ध्र तक अबाध रूप से परामृत रस के सिञ्चन द्वारा पैरों से मस्तक तक अपने को जो नित्य आप्लावित अनुभव करता है, वह अजर और अमर होता है।
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