साधक स्वयं महाप्रलय की कालाग्नि के समान सब प्राणियों के लिये भयङ्कर होकर दक्षिण की ओर मुख कर अत्यन्त उग्र दृष्टि के साथ, यौवनोल्लास सहित, पराप्रासादसंज्ञक मन्त्रमण्डल का १००८ जप करे।
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