शान्तिकर्म में सौम्य' मन्त्र का प्रयोग किया जाता है और इनके अधिक वर्ण चन्द्र एवं अमृत तत्त्व वाले होते हैं तथा अन्त में 'स्वाहा' होता है। क्रूर कर्मों में आग्नेय मन्त्रों का प्रयोग होता है। पुष्टि (समृद्धि) कर्मों में 'फट्' से युक्त मन्त्रों का, वशीकरण में वषट् से युक्त और मारण कर्मों में 'हूँ फट्' का प्रयोग होता है। स्तम्भन कर्मों में में नमः न का और शान्ति, पुष्टि कर्मों में 'स्वाहा' का प्रयोग होता है।
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