हे कुलेश्वरि! हे प्रिये! कुण्ड में संस्कृत अग्नि में आवरणों सहित देवता का आवाहन एवं ध्यान जिस कर्म में जितना निर्दिष्ट हो, अयुत (दस हजार) या नियुत (एक लाख) या प्रयुत (दस लाख) आहुतियाँ, हे देवि! विधिवत् तन्मय होकर प्रदान करे।
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