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कुलार्णव • अध्याय 16 • श्लोक 78
अयुतं नियुतं वापि प्रयुतं वा कुलेश्वरि । तत्तत्कर्मोदिते कुण्डे संस्कृते हव्यवाहने ॥ आवाह्य देवतामस्मिन् ध्यात्वा सावरणां प्रिये । विधिवज्जुहुयाद्देवि तद्गतेनान्तरात्मना ॥
हे कुलेश्वरि! हे प्रिये! कुण्ड में संस्कृत अग्नि में आवरणों सहित देवता का आवाहन एवं ध्यान जिस कर्म में जितना निर्दिष्ट हो, अयुत (दस हजार) या नियुत (एक लाख) या प्रयुत (दस लाख) आहुतियाँ, हे देवि! विधिवत् तन्मय होकर प्रदान करे।
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